Friday, 17 July 2015

चुनावी तड़का.....

चुनावी तड़का ........
"आज का नाटक यही खत्म होता है "
तुम जीत के खुश
हम हार के भी खुश
क्योकि
लड़ाई सिर्फ हमारी तुम्हारी नहीं है
बल्कि
लड़ता तो कोई और है
हरता भी कोई और है
और
जीतता भी कोई और है।
हम तो सिर्फ चुनावी रण के मोहरे है ठप्पे है
या फिर कठपुतलिया ...........बस दोस्त अब कुछ दिनों के लिए मेरा नाटक खत्म
क्योकि मेरा नाटक नाटक है
कोई तमाशा नहीं
बस
अब तुम
सिर्फ तमाशा देखो
सियासत
का ...................?

No comments:

Post a Comment