Friday, 17 July 2015

शहादत.......

तुम हमेशा जिंदा रहोगे
क्योकि
शहादत दी है आपने
आपका कोई मकसद था
जिदगी का ......
पता नहीं क्यों रुक जाती है कलम जब सोचता हूँ इन्कलाब की बात 
अब आन्दोलन नहीं होता मुझ से आज़ादी को बरकरार रखने का क्यों सोचता की कंधा किसी का बंदूक मेरी  मुझे पता है इस तरह नहीं होगा इन्कलाब ..........घुट घुट के खत्म हो रहा खून का उबाल पैरो में अजीब सी जकडन है और अजीब बात है की गुलाम मानसिकता जिन्दा है
और मै ......
पता ही नहीं चला की मै कब मर गया......और जिंदा है सिर्फ मुर्दाबाद।।

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