Monday, 10 August 2015

माफीनामा.....

माफ़ी चाहता हूँ......
उनसे  जिनके काम मैं ना आ सका
जिन्हों ने बुलाया मैं जा नही सका
जो देख के हँसते थे  और मै मुस्करा न सका
ख्बाव थे जो मेरे उनके ख्याल में मैं आ न सका
दुश्मन जो थे मेरे मैं उनपे तलवार उठा न सका
रूठे यार को घुँगरू बाँध के मैं मना न सका
दर्द तेरे के वो शब्द कागज पे मैं उतार न सका
तू सामने हो कर भी मेरी समझ मैं आ न सका
उम्र बीत गई तुझे मनाते पर् मैं मना न सका
नज़र उठा कर भी तुमसे
शायद तब नज़र मिला न सका
कौम की खतिर इंकलाब का गीत गा न सका
रोटी खतिर लिखता रहा तेरी wha पा न सका
झूठा जीवन इक मिट्टी है मैं उसे उतार न सका
ख़ुशी या मातम पे आँसू मैं बहा न सका
लिखना चाहती थी कलम जो
मेरी वो आजादी उसे दे न सका
मेरे शब्दों
मेरे अर्थो
मेरी कविता
मेरे गीत
मेरे नाटक
मेरे किरदार
मेरे यार
मेरे प्यार
मेरे उपकार
मेरे कागज
तुम से नजर मिला नही सका
माफीनामा पास है मेरे 
मैं बुजदिल कमजोर
फिर भी
तेरी माफ़ी पा ना सका
मैं माफ़ी चाहता हूँ......

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