Tuesday, 25 August 2015

वो कही गुम था .....

नक्शा उठा के देखा तो सिर्फ
लकीरो के इलावा कुछ न था
हर कदम पे धरती  बंटी हुई
दीवारो के इलावा कुछ न था.....
लौट आओ इक आवाज थी बस
पेड़ जंगल  में थे सलीब जैसे
मगर घर का मेरे बस पता गुम था......
मैं जिन्दा था और वो इक पथर था
दहलीज थी उसकी और मेरा सिर था
इतफ़ाक देख आशीर्वाद तो था उसका
मगर मेरे सिर पे जो था वो इल्जाम गुम था......
वक्त ने खुदखुशी की थी जब पहनी
इतिहास ने आँखों पे काली पट्टी
दफन था कब्र में खुद ही खुद की
इक् ख़याल जिन्दा था मगर ख्बाव ग़ुम था...
कॅलण्डर पे लकीरे थी कटी हुई तारीखों पे
चाँदनी रात को मिलने आना था उसने
बस सुनसान तन्हाई का इक आलम था
वो पूर्णिमा की रात थी मगर चाँद ग़ुम था........
क्या करोगे सुन कर हमारी कथा कहानियाँ
तमाशा था बस किरदार अपना चोराहे का
बन के कठपुतली लटका हूँ अब दीवारो पे
नचाता था उँगलियों पे बस वो मदारी गुम था....

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