Thursday, 6 August 2015

भीड़ का चेहरा......

सब का इक चेहरा है
जो मुस्कराता है
मुरझाता है
गुस्सा
और कभी
शांत
भी नज़र
आता है  ..........
भीड़ है चेहरों की
लेकिन
मेकअप से लबालब....
हर चहेरा इस इंतज़ार में देर तक दर्पण के आगे टिकता है
की
कोई कहे की तुम कितने खूबसूरत
सुंदर ........लग रहे हो
हम भी चहेरे की सब्जी मण्डी में भूल जाते है की हम सुंदर है  या नही
इक और चेहरा है
सब के पास
उसे देख कर लगता है
की दर्पण भी झूठ
और दुनिया  भी
बस उस आपने आपने चहेरे के सच को
हम जानते हुए भी नही जानते
समझते हुए भी
नही समझते
क्योकि
भीड़ बहुत है चेहरों की
लेकिन भीड़ का कोई
चेहरा नही होता..........शायद

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