Tuesday, 8 September 2015

कुछ छुपा होता है

कभी कभी मकसद नही होता है
तब भी  कोई सफर होता है
घर की दीवारे खड़ी तो हो जाती है
घर में कोई अपना हो तो ही घर होता है
दुया सलाम जरूरत की हो जब
तब रोज इक नए रिश्ते का जन्म होता है
भटकता रहता है दर दर वो फकीर बन कर
सूखे पत्ते का सफर अपनीमर्जी का कब होता है
सोचा कुछ देखा कुछ और समझा  कुछ 
अकेला हूँ लेकिन मुझमे भी कुछ छुपा होता है

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