Wednesday, 9 September 2015

ख़याल और ख्बाव

भोली
है नटखट है
रूठती है पर मान जाती है
उसकी हर शरारत
मन को  छु जाती है
बेटी है
जो घर को घर बनती है
आँखों के सामने मेरे
कितने किरदार निभाती है
अपनी हो कर भी पराई बन जाती है
अब वो कभी कभी
आती है
दुःख दर्द पूछ के जाती है
शुक्र है
वो मुस्कराती है
और आपने साथ अपनी ही
हम शक्ल
छोटी सी बेटी लाती है
मेरे घर आँगन में
वर्षो बाद
इक कहानी लौट आती है
वो  भी
भी भोली है नटखट है
रूठ के मान जाती है.............
दो चार दिन
रह
कर आखिर वो भी चली जाती है ....
अब तो कलम है हाथ में
और उसकी यादें
इक कविता बन
कर रोज
ख़याल में आती है
और ख्बाव बन के छुप जाती है।।

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