Wednesday, 17 August 2016

रास्ते ज़िन्दगी के

मैं
ख़याल
से ख्बाव और फिर
मन
के सवाल
और जबाव सिर्फ खंजर
पैर खानाबदोश
दिल में उम्मीद
जिंदगी पे रोना
और मौत पे हँसना 
कुछ अनकहे अल्फाज
सफेद कागज
मुक्ति का गीत
जन्म की कमान से निकला हुआ तीर
घरती पे अग्नि की चादर
और जलती हुई जीवन की कथा
जो तुम नही समझ सकते और मैं
लिख नही सकता  ......
आपने कन्धों पे
आपने ही सिर का भार
ढो रहा हूँ
आपने आप को खुद इक
मजदूर बना कर
बस वो जंग
जो खुद के भीतर है
कितने हिस्सों में अलग थलग
मैं उसका इक नाम हूँ
जनाब.........
हाज़िर होकर भी गैरहाजिर
दिखने वाला .....मैं
तुम
जैसा ही
मुक्कमल
इंसान हूँ

No comments:

Post a Comment