Thursday, 25 August 2016

मैं और तू....

मै ........और .....वो
इक दूसरे को अक्सर आप कह कर बुलाते थे फिर
उसने कहाँ इक दिन
तुम मुझे तुम कह कर बुलाया करो
क्योकि
तुम शब्द में आपनापन है
हम मिलते थे
तो सब शब्द खत्म हो जाते
और बिना शब्द के ही
नए
अर्थ जन्म ले लेते
फिर इक दिन हमारे बीच इक शब्द आया
तू.......
शायद
तू ही तू
इक दूसरे को जानने वाले
हम दोनों
इक दूसरे को पहचाने लगे ।
दुनिया को हम दो दिखाई देते थे
मगर हम इक ही थे ।
लेकिन
फिर अचानक
रिश्ते में उतर गए
इक ही घर में रहने लगे
अब कभी कभी
नए शब्द जन्म ले लेते है
जैसे तू तू मैं मैं
और
हम अक्सर
कह देते है की आप पहले जैसे नही रहे ........
और  सोचते है
की कोई
पहले जैसा कहाँ रहता है .....
तू और मैं
सिर्फ
दो शब्द
और कुछ भी नही
ये दुनिया की भीड़ में गुम हुए हम लोग .....
आज भी आपने जैसा ढूढ़ते है ......
तभी तो कुछ बोलते नही
चुप हो जाते है
और जब देर बाद रिश्तों की भीड़ में से निलक कर मिलते है तो अक्सर ये शब्द होते है
क्या यार तुम भी ना........और फिर
शब्दों के  जंगल में मौन हो जाते है
तब कोई अर्थ जन्म नही लेता .....shaad

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