Sunday, 25 September 2016

जज्बात

मेरे शब्द
आपके लिए नये नही....
बल्कि उनके अर्थ  अलग अलग है
वक्त और मौसम के हिसाब के
ख़याल के
ख्बाव के
देखो मैं इस बार कुछ भी नही बोला
तुमने देखा और
और मेरे सिर्फ
देखने के भी अर्थ निकाल लिए
शब्द गूंगे होते है
सिर्फ आवाज ही होती है
अक्षरो का जोड़ तोड़ होता है
उच्चारण
होता है
देखा इस बार कुछ बोला भी नही
और बोलने से पहले
ही तुम समझ गए
तुम मुझे जानते हो शायद
इसलिए मेरे शब्दों को
सुन कर अर्थ निकलते हो
वो मुझे पहचानता है
और बोलने से पहले ही समझ जाता है
शब्द तो मौन के होते है
बस
जिसका इक ही अर्थ होता है श्रदा
जिसमे इक मूक
और दूसरा दर्शक होता है
इसका अर्थ
मूकदर्शक
न समझना
नही तो मुझे
लिखना
पड़ेगा
की शब्द अधूरे और
अर्थ भी अधूरे
या
सिर्फ
अंदाजा ख्याल....
लिख दिए है शब्द कुछ इधर उधर के
और अब तुम कोई अर्थ दे देना
जिस से मेरे शब्द पवित्र हो जाये
और तुम मुझे
पहचान सको..........
शब्दों में अर्थो में और
मौन में......
इसलिए उगते हुए सूरज के सामने इक दीपक जलाया है........
डूबते हुए सूरज के सामने भी समझ सकते हो ............shaad

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