Thursday, 29 September 2016

चुनाव

चुनावी तड़का
क्या वक्त आ गया है चुनावी मोसम में मेरे कुछ मित्र अलग अलग पार्टियो के साथ हो गए है अब तो चर्चा भी युद्ध की तरह होती है ego जिंदा हो रही  है
wah सियासत
"सियासत तवाइफ  है कोठे की
इशारा किसी को होता है
नजारा कोई लेता है "
हर कोई बे मतलब का हक जीता रहा है
रूठने मनाने के साथ
शक
और निगरानी
का दौर शुरू
चमचो की चाँदी
या चाँदी के चमचे
सबको बेटे ही बेटे ही
दे रहे है सब
मित्रो मै तो चुप हूँ बस इतना ही
     "मसले जैसे जैसे उलझते है
      वो तो तब तब मुस्कराती है
      सियासत मसलों के सर पे ही
       सता में आती है "
हर कोई हर किसी पे ठप्पा लगा रहा है अपना होने का
हर कोई हर तरफ हाजरी भर के चुनावी ठप्पो से बच रहा है
बस ये ही संकल्प है मेरा
मेरी वोट
मेरी ताकत
और मेरी अक्ल
जिंदाबाद......

No comments:

Post a Comment